Thursday, September 27, 2018

एक खत...

एक खत आज मैंने तेरे नाम है लिखा,
बरसों बाद एक फ़रियाद है लिखा,
एक खत आज मैंने तेरे नाम है लिखा।

ना समझना तुम इसे मेरी मजबूरी,
जो विनती एक बार फिर किया,
एक खत आज मैंने तेरे नाम है लिखा।

छोड़ गए थे जिसे गलियों में तुम,
ना समझना मैं वह बेबस-लाचार हूं।
तोड़ गए थे जिस प्रीत को तुम,
मैं उस दर्द की ललकार हूं।

उन लम्हों में तड़प कर हूं फौलाद मैं बनी,
उस रिश्ते से बिछड़ कर हूं इंसान मैं बनी।
जाना इस संसार को,
और देखा हर सच को,
अब जीने लगी हूं मैं हर एक पल को।

पाया है अपनी मंजिल,
कर रही हूं हर सपने को पूरा,
अब लौट के नहीं जाना मुझको,
उन बिते लम्हों में दोबारा।

बस इतनी-सी विनती है तुम से,
लौट अब ना आना फिर से।

ना समझना तुम इसे मेरा अहंकार,
नाहिं समझना इसे तुम अपना अपमान।
बस इतनी सी गुरेज है तुमसे,
लौट के ना आना फिर एक बार।

एक खत आज मैंने तेरे नाम है लिखा,
एक फ़रियाद है लिखा,
उन लम्हों को मैं फिर से ना जी पाऊंगी,
अब की टूटी तो ना संभल पाऊंगी।

मान लेना मेरी यह दरख़ास,
लौट ना आना तुम फिर एक बार।
एक आखिरी सलाम है लिखा...
एक खत आज मैंने तेरे नाम है लिखा।।

4 comments: