कभी समझा कि तू सहेली है,
कभी माना कि तू पहेली है।
कभी पाया तुझमें चांद-सी शीतलता,
कभी जाना है तुझमें सूरज-सा तेज भी।।
कभी सीखा हंसना तुझसे,
कभी टूटकर रोई भी।
कभी दिखाया तुने पगडंडी,
कभी मिली राहें अंधेरी भी।।
कभी होती तू मोम-सी कोमल,
कभी तुझमें दिखता एक दृढ़ पर्वत।
कभी तूने हजारों को अपना बनाया,
कभी बनाया अपनों को भी पराया।
कभी तूने मंज़िल बतलाई,
कभी हाथ से फिसली एक जीत भी।।
आखिर तू क्या है जिंदगी...
और क्या है तेरा फ़लसफ़ा।
कैसे कोई पहचाने तुझे,
आखिर क्या है तेरा फ़साना??
तू ही बता मुझे ऐ जिंदगी,
तू ही बता अब...
तेरा ठिकाना!!!
कभी माना कि तू पहेली है।
कभी पाया तुझमें चांद-सी शीतलता,
कभी जाना है तुझमें सूरज-सा तेज भी।।
कभी सीखा हंसना तुझसे,
कभी टूटकर रोई भी।
कभी दिखाया तुने पगडंडी,
कभी मिली राहें अंधेरी भी।।
कभी होती तू मोम-सी कोमल,
कभी तुझमें दिखता एक दृढ़ पर्वत।
कभी तूने हजारों को अपना बनाया,
कभी बनाया अपनों को भी पराया।
कभी तूने मंज़िल बतलाई,
कभी हाथ से फिसली एक जीत भी।।
आखिर तू क्या है जिंदगी...
और क्या है तेरा फ़लसफ़ा।
कैसे कोई पहचाने तुझे,
आखिर क्या है तेरा फ़साना??
तू ही बता मुझे ऐ जिंदगी,
तू ही बता अब...
तेरा ठिकाना!!!
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