Thursday, November 21, 2019

ज़िन्दगी तू कहां खो गई...

                  ज़िन्दगी तू कहां खो गई!
                  संग चलते चलते जैसे,       
                  राहें हो मुड़ गई।
                  ज़िन्दगी तू कहां खो गई!

                  अब ना किसी के चेहरे पर,
                  है मुस्कान बिखरती।
                  नाहिं किसी की बातों से,
                  है मिठास छलकती।
                  ज़िन्दगी ना जाने तू,
                  कहां खो गई है?
                  तेरे ही खोज में ये जहां,
                  तुझसे ही दूर हो गई है।
                  ज़िन्दगी तू कहा खो गई है?








              अब ना वो पहले वाली बात है,
              नाहिं मिलती अब मेलों की सौगात है।
              बचपन की वो हंसी - ठिठौली,
              दोस्तों संग वो हमजोली।
              ज़िन्दगी तू कहां खो गई!
             औरों को संवारते - संवारते,
             खुद को ही भूल गई।
              ज़िन्दगी तू कहां खो गई!

             भागदौड़ भरे इन पलों में,
             लोग लम्हें जीना भूल गए।
             दूरसंचार के युग में,
             अपनों से ही दूर हो गए।
             ज़िन्दगी तुझे सुलझाने में,
              हम खुद में ही उलझ गए।
              तेरी तलाश में ए ज़िन्दगी,
             तुझसे ही दूर हो गए।।


Wednesday, November 6, 2019

चलो अब लौट चलें

सुनो ...
बहुत हो गया खुद से भागना,
चलो अब लौट चलते हैं।
यूं खुद से ही क्या नज़रे चुराना,
चलो ना अब लौट चलते हैं।

क्या रखा इस फरेबी जमाने में,
जहां दो प्यार के बोल नहीं।
ऊपर से तो कुछ और है दिखाती ये दुनियां,
फितरत से इनकी है कौन वाक़िफ यहां।

सैकड़ों की भीड़ में भी,
हर कोई है तन्हाई में डूबा।
खुद से ही बेखबर यहां,
ना जाने है कहां किसे ढूंढता।

 

क्या ढूंढते आए थे यहां,
और क्या है तुमने पाया?
छल-कपट-ईष्या-द्वेष में,
खुद को ही मिटा है दिया।

क्या रखा इस गर्दिश में,
क्यों घुट - घुट कर यूं दर्द में जीना?
छोड़ो अब इस फरेब को,
क्या ही इससे पाना?

सुनो,
बहुत हो गया खुद से भागना,
चलो अब लौट चलते हैं।
सुंदर, सपनों-सा प्यारा,
खुद से ही उम्मीद सजाते हैं।
चलो ना अब लौट चलते हैं।।