सुनो ...
बहुत हो गया खुद से भागना,
चलो अब लौट चलते हैं।
यूं खुद से ही क्या नज़रे चुराना,
चलो ना अब लौट चलते हैं।
क्या रखा इस फरेबी जमाने में,
जहां दो प्यार के बोल नहीं।
ऊपर से तो कुछ और है दिखाती ये दुनियां,
फितरत से इनकी है कौन वाक़िफ यहां।
सैकड़ों की भीड़ में भी,
हर कोई है तन्हाई में डूबा।
खुद से ही बेखबर यहां,
ना जाने है कहां किसे ढूंढता।
क्या ढूंढते आए थे यहां,
और क्या है तुमने पाया?
छल-कपट-ईष्या-द्वेष में,
खुद को ही मिटा है दिया।
क्या रखा इस गर्दिश में,
क्यों घुट - घुट कर यूं दर्द में जीना?
छोड़ो अब इस फरेब को,
क्या ही इससे पाना?
क्या ही इससे पाना?
सुनो,
बहुत हो गया खुद से भागना,
चलो अब लौट चलते हैं।
सुंदर, सपनों-सा प्यारा,
खुद से ही उम्मीद सजाते हैं।
चलो ना अब लौट चलते हैं।।

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