Monday, December 31, 2018

वो Depression के दिन थे ......

मेरे घर का एक कमरा,
जहां मैं खुद को कैद रखती थी।
और उसी घर के छत का वो कोना,
जहां बैठ मैं हर शाम रोती थी।
हां वो Depression के दिन थे,
जब मैं खुद को खोती थी।

अरसे बाद मिलते थे जो लोग,
उनका पहला Reaction यही होता
"ये शेरनी भीगी बिल्ली कैसे बन गई"
हर वक़्त खिलखिलाने वाली,
यूं चुप चाप कैसे बैठ गई!!

बहुत मुश्किल होता था वो,
सब के साथ रहना।
और अपनों के बीच भी,
खुद को अनजान पाना।
ना किसी से मिलने की इच्छा,
ना किसी को देखने की चाहत।
बस सबसे इस उम्मीद में छिपाती,
कि एक दिन मैं खुद से छिप जाऊंगी।
दुनियां के इस शोर से,
खुद को आजाद कर पाऊंगी।


बहुत मुश्किल होता था वो,
चेहरे पे 10 मिनट की,
झूठी  मुस्कान लाना।
और उससे भी ज्यादा डर...
इस बात का लगता,
अगर ये ना कर पाई तो क्या होगा।


हां वो Depression के दिन थे,
जब मैं हंसने से भी डरती थी,
जब मैं खुद को हर पल खोती थी।।



दो मुलाकात

याद है उसे,
वो मुलाकातें।
वर्षों बाद तुम्हारे संग,
किए कुछ बातें।


वो चंद मिनटों का साथ,
और फिर महीनों का लंबा इंतजार।
अब भी याद है उसे।।

वो Bike की पिछली Seat पर बैठ,
तुम्हारे संग उसकी छेड़खानी।
और अचानक से तुम्हारा,
उसका हाथ थाम लेने वाली बात।

वो  Short वाली Long drive,
और वो 1:30 घंटे की पहली मुलाकात।
तुम्हारे वापस जाते वक़्त,
तुम्हारे कंधे पर सर रख...
रोने वाली बात!!
अब भी याद है उसे।


वो नदी का किनारा,
और तुम्हारा साथ।
सूरज की पहली किरण संग,
दूसरी मुलाकात।

हाथों में हाथ,
एक दूसरे का साथ।
"कोई देख ना ले" वाला डर,
और खुद से ही शरमाने वाली बात!!
याद है उसे।


वो जाते वक़्त,
तुमसे गले मिलने वाली नाकाम कोशिश।
और तुम्हारे जाने के बाद,
बरबस टपकते आसुओं का साथ।


अब भी याद हैं उसे,
वो दो मुलाकातें।।


Tuesday, December 18, 2018

ये बेरूखी भी जरूरी थी...

मेरा तुमसे दूर  जाना,
मेरी choice नहीं मजबूरी थी।
और शायद वक़्त के लिहाज से,
ये दूरियां भी जरूरी थीं।


कितना कुछ कहना चाहती हूं मैं तुमसे,
पर तुम्हारी चूपी एक दीवार बन जाती है।
हमारे बीच आ चुके उस तारीक का,
अहसास करवाती है।
और...
और मेरे जज्बातों को...
 खामोश रहने का हुकम्म दे जाती है।


जी करता है तुम्हें खुद में समेट लूं,
और आंखो के इस सैलाब से रिहाई पा लूं।
बिन कुछ कहे हर अल्फ़ाज़ समझा दूं,
और तुम्हें तुमसे ही चुरा लूं।


काश! काश मैं ये सपना मुकम्मल कर पाती,
तुम्हें अपना बना पाती।
या काश उस बीते लम्हें में जा पाती,
जहां तुम और तुम्हारे दर्द की
मैं बराबर की हकदार थी।


पर अब वो दौर गुजर चुका है,
और तुम मेरे पास होकर भी...
मुझसे कोसों दूर हो।
इन चंद लम्हों की दूरियों ने,
हमें हमसे अग्यार कर दिया।
और शायद वक़्त के लिहाज से,
 ये बेरुखी भी जरूरी थी।

Wednesday, December 12, 2018

बन के एक बेताब परिंदा...

बन के एक बेताब परिंदा,
मैं उड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से,
इश्क़ करने चली हूं।।

तोड़ के पैरों की बेड़ियां,
रुख हवा का मोड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से,
इश्क़ करने चली हूं।।
                   
हौसलों की चूनर समेटे,
समंदर को नापने चली हूं।
आंखो की काली काजल से,
बदरी अमावस की छटने चली हूं।।

चली हूं करने खुद की रचना,
लहरों के विपरित बढ़ी हूं।
आसमां के सितारों को,
कंधों पे सजाने चली हूं।।

बन के एक बेताब परिंदा,
मैं उड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से
इश्क़ करने चली हूं।।

Monday, December 10, 2018

ये इश्क़ मेरा कहलाएंगा

वो आधी भारी चाय की प्याली,
और तुम्हारा "लेट हो रही" कह जाने वाली कहानी,
अब ये कहानी महज कहानी रह जाएंगी,
और ये मुलाकात अधूरी ही सही...
पर ये मुलाकात मेरी कहलाएंगी।

तुमसे मिलने पर मेरा यूं खिल उठना,
और जब भी तुम ख्यालों में भी मुझे याद करती...
तुम्हारे उन ख्यालों से मेरा बेचैन हो जाना,
बेशक ये बेचैनी अधूरी ही सही...
ये बेचैनी मेरी कहलाएंगी।

वो late night's chats...
और वो video calls and texts,
ये बातों का सिलसिला अब थम जाएंगा,
और बस यादों का पुलिंदा रह जाएगा।
बेशक ये यादें ही सही,
ये यादें मेरी कहलाएंगी।

अब  ना तुझसे मिलना होगा,
नाहिं जुड़ने का कोई जरिया होगा।
और ये इश्क़ अधूरा रह जाएगा।
बेशक अधूरा ही सही,
ये इश्क़ मेरा कहलाएंगा।

उसे अब तुम मुकम्मल करना

वो  जो इश्क़ मेरा था...
उसे अब तुम मुकम्मल करना।
वो मेरा ना हो सका तो क्या!
अब तुम ही उसकी बरक्कत बनना।।

छोड़  तो गया  ही था वो मुझे,
अब अपने रास्ते मैं खुद ढू़ढ लूंगी।
पर वो थोड़ा नादान है...
अकेले खुद सभंल ना पाएंगा,
ज़रा तुम उसका हाथ थामें रखना।
वो जो मेरा था,
उसे अब तुम मुकम्मल करना।।

खुद का किनारा तो मैं बन जाऊंगी,
जमाने का हर वार भी सह जाऊंगी।
पर वो बड़ा भावुक है...
अश्कों में बह जाता है।
ज़रा तुम उसकी पतवार बन जाना।
वो जो मेरा था,
उसे अब तुम मुकम्मल करना।।