जहां मैं खुद को कैद रखती थी।
और उसी घर के छत का वो कोना,
जहां बैठ मैं हर शाम रोती थी।
हां वो Depression के दिन थे,
जब मैं खुद को खोती थी।
अरसे बाद मिलते थे जो लोग,
उनका पहला Reaction यही होता
"ये शेरनी भीगी बिल्ली कैसे बन गई"
हर वक़्त खिलखिलाने वाली,
यूं चुप चाप कैसे बैठ गई!!
बहुत मुश्किल होता था वो,
सब के साथ रहना।
और अपनों के बीच भी,
खुद को अनजान पाना।
ना किसी से मिलने की इच्छा,
ना किसी को देखने की चाहत।
बस सबसे इस उम्मीद में छिपाती,
कि एक दिन मैं खुद से छिप जाऊंगी।
दुनियां के इस शोर से,
खुद को आजाद कर पाऊंगी।
बहुत मुश्किल होता था वो,
चेहरे पे 10 मिनट की,
झूठी मुस्कान लाना।
और उससे भी ज्यादा डर...
इस बात का लगता,
अगर ये ना कर पाई तो क्या होगा।
हां वो Depression के दिन थे,
जब मैं हंसने से भी डरती थी,
जब मैं खुद को हर पल खोती थी।।



