Tuesday, December 18, 2018

ये बेरूखी भी जरूरी थी...

मेरा तुमसे दूर  जाना,
मेरी choice नहीं मजबूरी थी।
और शायद वक़्त के लिहाज से,
ये दूरियां भी जरूरी थीं।


कितना कुछ कहना चाहती हूं मैं तुमसे,
पर तुम्हारी चूपी एक दीवार बन जाती है।
हमारे बीच आ चुके उस तारीक का,
अहसास करवाती है।
और...
और मेरे जज्बातों को...
 खामोश रहने का हुकम्म दे जाती है।


जी करता है तुम्हें खुद में समेट लूं,
और आंखो के इस सैलाब से रिहाई पा लूं।
बिन कुछ कहे हर अल्फ़ाज़ समझा दूं,
और तुम्हें तुमसे ही चुरा लूं।


काश! काश मैं ये सपना मुकम्मल कर पाती,
तुम्हें अपना बना पाती।
या काश उस बीते लम्हें में जा पाती,
जहां तुम और तुम्हारे दर्द की
मैं बराबर की हकदार थी।


पर अब वो दौर गुजर चुका है,
और तुम मेरे पास होकर भी...
मुझसे कोसों दूर हो।
इन चंद लम्हों की दूरियों ने,
हमें हमसे अग्यार कर दिया।
और शायद वक़्त के लिहाज से,
 ये बेरुखी भी जरूरी थी।

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