बन के एक बेताब परिंदा,
मैं उड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से,
इश्क़ करने चली हूं।।
तोड़ के पैरों की बेड़ियां,
रुख हवा का मोड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से,
इश्क़ करने चली हूं।।
हौसलों की चूनर समेटे,
समंदर को नापने चली हूं।
आंखो की काली काजल से,
बदरी अमावस की छटने चली हूं।।
चली हूं करने खुद की रचना,
लहरों के विपरित बढ़ी हूं।
आसमां के सितारों को,
कंधों पे सजाने चली हूं।।
बन के एक बेताब परिंदा,
मैं उड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से
मैं उड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से,
इश्क़ करने चली हूं।।
तोड़ के पैरों की बेड़ियां,
रुख हवा का मोड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से,
इश्क़ करने चली हूं।।
हौसलों की चूनर समेटे,
समंदर को नापने चली हूं।
आंखो की काली काजल से,
बदरी अमावस की छटने चली हूं।।
चली हूं करने खुद की रचना,
लहरों के विपरित बढ़ी हूं।
आसमां के सितारों को,
कंधों पे सजाने चली हूं।।
बन के एक बेताब परिंदा,
मैं उड़ने चली हूं।
आज मैं खुद से


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